160 से अधिक वर्षों तक भारत अंग्रेज़ों द्वारा लिखे आपराधिक कानूनों पर चला — भारतीय दंड संहिता (1860), दंड प्रक्रिया संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872)। ये एक उपनिवेश को नियंत्रित करने हेतु बने थे, नागरिकों की सेवा हेतु नहीं। दिसंबर 2023 में संसद ने तीन प्रतिस्थापन संहिताएँ पारित कीं, जो 1 जुलाई 2024 को लागू हुईं।
न्याय एवं कानूनी सुधार
1 जुलाई 2024 को, भारत ने तीन औपनिवेशिक संहिताओं — भारतीय दंड संहिता (1860), CrPC व साक्ष्य अधिनियम — को भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम से बदल दिया। सुधार पीड़ितों व प्रौद्योगिकी को केंद्र में रखता है, e-FIR से फोरेंसिक साक्ष्य तक। काउंटर न्यायालय अभिलेखों का बढ़ता डिजिटलीकरण दिखाता है (सांकेतिक)।

| वर्ष | Court records online |
|---|---|
| 2014 | 2 crore |
| 2015 | 4 crore |
| 2016 | 6 crore |
| 2017 | 9 crore |
| 2018 | 12 crore |
| 2019 | 16 crore |
| 2020 | 19 crore |
| 2021 | 22 crore |
| 2022 | 25 crore |
| 2023 | 27 crore |
| 2024 | 28 crore |
| 2025 | 29 crore |
| 2026 | 30 crore |
यह क्यों मायने रखता है पुरानी संहिताएँ 19वीं सदी के औपनिवेशिक शासन हेतु लिखी गई थीं। नए कानून संगठित अपराध व मॉब लिंचिंग जैसे अपराध जोड़ते हैं, गंभीर अपराधों में फोरेंसिक अनिवार्य करते हैं, ऑनलाइन व ज़ीरो-FIR की अनुमति देते हैं, और जाँच व मुकदमे की समय-सीमा तय करते हैं — तेज़, अधिक सुलभ न्याय हेतु।
- तीन नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 को लागू हुए, IPC, CrPC व साक्ष्य अधिनियम की जगह।
- अब FIR ऑनलाइन (e-FIR) व किसी भी थाने (ज़ीरो-FIR) में, CCTNS के ज़रिए दर्ज हो सकती है।
- ICJS के ज़रिए आपराधिक न्याय प्रक्रिया 1 जनवरी 2027 तक पूर्णतः डिजिटल होने का लक्ष्य।
- गंभीर अपराधों में फोरेंसिक जाँच अब अनिवार्य; समन इलेक्ट्रॉनिक रूप से जारी हो सकते हैं।




इतिहास
उल्लेखनीय उपलब्धि
तीन नए कानून — भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) व भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) — ने औपनिवेशिक त्रयी को एक झटके में बदल दिया। ये आधुनिक अपराध (संगठित अपराध, आतंकवाद, मॉब लिंचिंग) जोड़ते हैं, गंभीर अपराधों में फोरेंसिक जाँच अनिवार्य करते हैं, व पीड़ितों तथा गति को केंद्र में रखते हैं।
यह कैसे काम करता है
शिकायतें अब e-FIR ऑनलाइन या किसी भी थाने में ज़ीरो-FIR के रूप में दर्ज हो सकती हैं, जो CCTNS डेटाबेस में लॉग होती हैं। गंभीर अपराध-स्थलों पर फोरेंसिक टीम आवश्यक; समन व साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक रूप से चल सकते हैं; और जाँच व मुकदमों की वैधानिक समय-सीमा है। ICJS पुलिस, न्यायालय, जेल, अभियोजन व फोरेंसिक को जोड़ता है।
आगे की राह
नई संहिताओं के साथ, e-Courts परियोजना ने करोड़ों मामलों के अभिलेख डिजिटल किए हैं व वर्चुअल सुनवाई तथा e-फाइलिंग शुरू की है। लक्ष्य एक ऐसी न्याय-व्यवस्था है जो तेज़, अधिक पारदर्शी व फ़ोन से सुलभ हो — उस लंबितता को घटाते हुए जो भारतीय न्यायालयों को लंबे समय से जकड़े है।
आगे का रास्ता
कानून पारित करना आसान हिस्सा है; कठिन हिस्सा कार्यान्वयन है — पुलिस, अभियोजक, न्यायाधीश व फोरेंसिक कर्मियों का प्रशिक्षण, प्रयोगशाला क्षमता, व हर थाने तथा न्यायालय का डिजिटलीकरण। सरकार का लक्ष्य 1 जनवरी 2027 तक पूर्ण डिजिटल आपराधिक-न्याय शृंखला है। सफलता तेज़ दोषसिद्धि व कम विचाराधीन कैदियों में मापी जाएगी।
आँकड़ों में
3 नई आपराधिक संहिताएँ 1 जुलाई 2024 से लागू। इन्होंने IPC (1860), CrPC व साक्ष्य अधिनियम (1872) की जगह ली। e-FIR / ज़ीरो-FIR अब CCTNS के ज़रिए देशभर में। ICJS का 1 जनवरी 2027 तक पूर्ण डिजिटल लक्ष्य। स्रोत: गृह मंत्रालय, e-Courts, PIB।
स्रोत: MHA / e-Courts — new criminal laws (July 2024) and case-record digitisation. Counter illustrative.