दशकों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक था, अधिकांश हथियार विदेश से ख़रीदते हुए। 'मेक इन इंडिया' व आत्मनिर्भर भारत ने इसे बदलने की ठानी — हज़ारों वस्तुओं के आयात पर रोक लगाती सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों, अधिक FDI, और निजी व स्टार्टअप भागीदारी पर ज़ोर के साथ।
रक्षा और स्वदेशीकरण
भारत लंबे समय तक दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक था। 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत के तहत, घरेलू रक्षा उत्पादन एक दशक पहले के लगभग ₹47,000 करोड़ से बढ़कर रिकॉर्ड ~₹1.78 लाख करोड़ (FY26) पहुँचा, 12,300 से अधिक वस्तुओं के स्वदेशीकरण और निजी फ़र्मों व स्टार्टअप्स (iDEX के माध्यम से) के शामिल होने के साथ। स्वदेशी युद्धपोत, तेजस लड़ाकू, मिसाइलें व तोपें अब भारतीय लाइनों से निकलती हैं। काउंटर रक्षा उत्पादन का मूल्य दिखाता है।

| वर्ष | Defence production |
|---|---|
| 2014 | 0 ₹ lakh cr |
| 2015 | 1 ₹ lakh cr |
| 2016 | 1 ₹ lakh cr |
| 2017 | 1 ₹ lakh cr |
| 2018 | 1 ₹ lakh cr |
| 2019 | 1 ₹ lakh cr |
| 2020 | 1 ₹ lakh cr |
| 2021 | 1 ₹ lakh cr |
| 2022 | 1 ₹ lakh cr |
| 2023 | 1 ₹ lakh cr |
| 2024 | 2 ₹ lakh cr |
| 2025 | 2 ₹ lakh cr |
यह क्यों मायने रखता है अपने हथियार बनाने का अर्थ है ऐसी सुरक्षा जो काटी न जा सके, एक उच्च-तकनीक औद्योगिक आधार, कुशल नौकरियाँ, और एक नया निर्यात कमाने वाला — भारत अब 100+ देशों को रक्षा उपकरण निर्यात करता है।
- रक्षा उत्पादन ~₹0.5 → ~₹1.78 लाख करोड़
- 12,300+ वस्तुएँ स्वदेशी; 2029 तक ₹3 लाख करोड़ लक्ष्य
- स्रोत: रक्षा मंत्रालय




इतिहास
भारत में निर्मित, दुनिया के लिए
रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ~₹1.78 लाख करोड़ पहुँचा, 12,300+ वस्तुओं के स्वदेशीकरण के साथ। भारत अब अपना विमानवाहक, तेजस लड़ाकू, मिसाइलें, तोपें, युद्धपोत व पनडुब्बियाँ बनाता है — और 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात करता है, 2029 तक ₹3 लाख करोड़ उत्पादन लक्षित।
भारत के बनाए युद्धपोत व पनडुब्बियाँ
भारत की नौसेना अब अपना बेड़ा ख़ुद बनाती है: बीते दशक में जुड़े 40 में से 39 जहाज़ भारतीय शिपयार्डों में बने, और INS तमल (जुलाई 2025) भारत का आख़िरी आयातित युद्धपोत था। सतह पर हैं — विशाखापत्तनम-श्रेणी के स्टेल्थ विध्वंसक (प्रोजेक्ट 15B — चार जहाज़, 2021 से 2025), नीलगिरि-श्रेणी के स्टेल्थ युद्धपोत (प्रोजेक्ट 17A — INS नीलगिरि सहित सात जहाज़, 2025), कामोर्टा-श्रेणी की पनडुब्बी-रोधी कॉर्वेट, और INS विक्रांत, भारत में डिज़ाइन व निर्मित पहला विमानवाहक — अधिकांश ब्रह्मोस क्रूज़ व बराक-8 वायु-रक्षा मिसाइलों से लैस। पारंपरिक पनडुब्बियाँ प्रोजेक्ट 75 से: मझगांव डॉक में फ़्रांस के नेवल ग्रुप के साथ बनी छह स्कॉर्पीन/कलवरी-श्रेणी की नौकाएँ, INS कलवरी (2017) से INS वागशीर (जनवरी 2025) तक, और आगे प्रोजेक्ट 75I में छह वायु-स्वतंत्र-प्रणोदन नौकाएँ। और अरिहंत-श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियाँ (INS अरिहंत, 2016; INS अरिघात, 2024) भारत की परमाणु त्रयी का समुद्री अंग हैं, K-15 व K-4 मिसाइलें ले जाती हैं — तीसरी नौका व भारत की पहली स्वदेशी परमाणु आक्रमण पनडुब्बियों (प्रोजेक्ट 77) के साथ।
मिसाइलें व परमाणु त्रयी
नौसैनिक K-मिसाइलों से आगे, भारत के पास पूरी मिसाइल श्रृंखला है। अग्नि परिवार परमाणु त्रयी के ज़मीनी अंग का आधार है: अग्नि-V, 5,000-प्लस किमी की ICBM-श्रेणी मिसाइल, 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत बहु-वारहेड (MIRV) तकनीक के साथ परखी गई — भारत को अमेरिका, रूस, चीन, फ़्रांस व ब्रिटेन के छोटे समूह में लाते हुए — और साथ में हल्की, सड़क-गतिशील अग्नि-प्राइम। पारंपरिक प्रहार के लिए अस्त्र दृष्टि-सीमा-से-परे हवा-से-हवा मिसाइल, रुद्रम विकिरण-रोधी मिसाइल व सुपरसोनिक ब्रह्मोस हैं; और भारत हाइपरसॉनिक में बढ़ा है, ~मैक 8 पर लंबी दूरी की स्क्रैमजेट क्रूज़ मिसाइलें (ET-LDHCM) परखते हुए। लड़ाकू विमानों द्वारा उड़ाए जाने वाले हवाई अंग के साथ, ये ज़मीन-हवा-समुद्र परमाणु त्रयी पूरी करते हैं।
वायु रक्षा व ड्रोन युद्ध
भारत की वायु-रक्षा ढाल जान-बूझकर परतदार व बहु-स्रोत है: छोटी-से-मध्यम दूरी पर स्वदेशी आकाश व QRSAM, मध्य स्तर पर भारत-इज़राइली MRSAM/बराक-8, और लंबी दूरी की परत के लिए आयातित रूसी S-400 ट्रायम्फ — पाँच में से तीन स्क्वाड्रन प्राप्त — जो एकीकृत कमांड नेटवर्क से जुड़े हैं। ड्रोन भी वही स्वदेशी-व-आयातित मिश्रण चलाते हैं: नागस्त्र-1, भारत की पहली स्वदेशी लॉइटरिंग म्यूनिशन, और TAPAS व रुस्तम निगरानी UAV, साथ में विकासाधीन स्टेल्थ घातक लड़ाकू ड्रोन — जबकि 31 उच्च-सहनशक्ति MQ-9B प्रीडेटर अमेरिका से ~$4 अरब में ख़रीदे जा रहे हैं। इनमें से कई प्रणालियों का पहला बड़ा युद्ध-प्रयोग ऑपरेशन सिंदूर में हुआ — मई 2025 का चार-दिवसीय भारत-पाकिस्तान टकराव, जो पहलगाम में आतंकी हमले के बाद हुआ — और ब्रह्मोस व नागस्त्र-1 का पहला युद्ध-प्रयोग भी।
लड़ाकू विमान: तेजस से AMCA
हवा में, स्वदेशी तेजस हल्का लड़ाकू विमान निकट-अवधि की रीढ़ है, HAL से Mk1A अब वितरण में और भारी तेजस Mk2 विकासाधीन। बड़ा दाँव है उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA), पाँचवीं-पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू, जिसका निष्पादन मॉडल 2025 में स्वीकृत हुआ ताकि निजी कंपनियाँ सरकारी एजेंसियों के साथ प्रतिस्पर्धा करें; पाँच प्रोटोटाइप नियोजित, ~2035 तक शामिल करने का लक्ष्य। इस बीच भारत आयातित फ़्रांसीसी राफेल उड़ाता है — वायुसेना के लिए 36 व 26 नौसैनिक राफेल-M ऑर्डर पर — जबकि वायुसेना ~29 स्क्वाड्रन बनाम स्वीकृत 42 पर काम कर रही है।
यह कैसे काम करता है
भारत अपने हथियार राज्य व निजी खिलाड़ियों के मिश्रण से बनाता है: बड़े रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (विमानों हेतु HAL, इलेक्ट्रॉनिक्स हेतु BEL, युद्धपोतों हेतु शिपयार्ड), हथियार डिज़ाइन करने वाली DRDO प्रयोगशालाएँ, और तेज़ी से बढ़ता निजी क्षेत्र व हज़ारों MSME। राज्य 'सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों' से बदलाव घर की ओर करता है — वे वस्तुएँ जो अब आयात नहीं की जा सकतीं — बजट का बड़ा हिस्सा घरेलू ख़रीद हेतु आरक्षित करके, और iDEX कार्यक्रम से स्टार्टअप वित्तपोषित करके।
आगे की राह
घरेलू रक्षा उत्पादन 2024-25 में रिकॉर्ड ₹1.54 लाख करोड़ पहुँचा (एक दशक पहले लगभग ₹40,000 करोड़ से), निजी फ़र्में व MSME बढ़ता हिस्सा। लक्ष्य है 2029 तक ₹3 लाख करोड़ उत्पादन। कठिन सीमा उच्च-स्तरीय तकनीक है जो भारत अब भी आयात करता है — जेट इंजन, उन्नत सेंसर — जहाँ AMCA स्टेल्थ फ़ाइटर व स्वदेशी इंजन जैसे अगली-पीढ़ी कार्यक्रम परखेंगे कि क्या भारत अत्याधुनिक स्तर पर केवल बना नहीं, बल्कि डिज़ाइन कर सकता है।
आगे का रास्ता
भारत असेंबली व लाइसेंस-उत्पादन से हटकर अत्याधुनिक स्वदेशी डिज़ाइन की ओर लगातार बढ़ रहा है — जेट इंजन, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स व AMCA जैसे अगली-पीढ़ी के मंच अभी बन रहे हैं, और कुछ बड़े कार्यक्रम योजना से अधिक समय ले रहे हैं।
आँकड़ों में
रक्षा उत्पादन ~₹0.5 → ~₹1.78 लाख करोड़; 12,300+ स्वदेशी वस्तुएँ; 100+ देशों को निर्यात; 2029 तक ₹3 लाख करोड़ लक्ष्य। नौसेना: बीते दशक के 40 में से 39 जहाज़ भारतीय शिपयार्डों में बने। स्रोत: रक्षा मंत्रालय; भारतीय नौसेना।
स्रोत: Ministry of Defence — value of defence production (₹ lakh crore), FY2014–FY2026.