IREL (इंडिया) लिमिटेड, पूर्व में इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड, की स्थापना 18 अगस्त 1950 को हुई, और केरल के आलुवा स्थित इसका रेयर अर्थ्स डिवीज़न 1952 में चालू हुआ। भारत के मुख्य रेयर अर्थ अयस्क मोनाज़ाइट में यूरेनियम और थोरियम होते हैं, इसलिए यह एक निर्धारित पदार्थ है, जिसका खनन, प्रसंस्करण और शोधन सरकारी नियंत्रण में रखा गया है। IREL ने 2015-16 में ओडिशा में 11,200 टन प्रति वर्ष मिश्रित रेयर अर्थ क्लोराइड की स्थापित क्षमता वाला रेयर अर्थ निष्कर्षण संयंत्र चालू किया। दिसंबर 2022 में सरकार ने लोकसभा को बताया कि मोनाज़ाइट उत्पादन लगभग 4,000 टन प्रति वर्ष है, जबकि IREL की स्थापित प्रसंस्करण क्षमता लगभग 10,000 टन है, और उत्पादन लंबित खनन पट्टों और मंज़ूरियों के कारण सीमित है।
दुर्लभ मृदा और स्थायी चुंबक
रेयर अर्थ स्थायी चुंबक सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबकों में गिने जाते हैं और इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टरबाइनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा में इस्तेमाल होते हैं। भारत के पास दुर्लभ मृदा के बड़े संसाधन हैं: परमाणु खनिज निदेशालय के अनुमान के अनुसार 1.315 करोड़ टन मोनाज़ाइट में 72.3 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड है, और कठोर चट्टानों में 12.9 लाख टन और। फिर भी भारत में इन चुंबकों की माँग मुख्यतः आयात से पूरी होती है, और रेयर अर्थ ऑक्साइड से तैयार चुंबक बनाने की कोई एकीकृत सुविधा नहीं रही है। 26 नवंबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ऐसी 6,000 टन प्रति वर्ष क्षमता बनाने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना स्वीकृत की, और अगस्त 2026 में भारी उद्योग मंत्रालय को इसकी वैश्विक निविदा में 20 बोलियाँ मिलीं।

यह क्यों मायने रखता है आधिकारिक व्यापार आँकड़ों के अनुसार 2022-23 से 2024-25 के बीच भारत ने स्थायी चुंबकों के अपने आयात का मूल्य के हिसाब से 59.6% से 81.3% और मात्रा के हिसाब से 84.8% से 90.4% हिस्सा चीन से मँगाया। सरकार के अनुसार भारत दुर्लभ मृदा खनिजों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है, पर चुंबकों और संबंधित उत्पादों के लिए निर्भर है, और उसे उम्मीद है कि इलेक्ट्रिक परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स के बढ़ने से 2025 से 2030 के बीच भारत में चुंबकों की खपत दोगुनी हो जाएगी।
- दुर्लभ मृदा संसाधन (AMD, 28 जनवरी 2026 तक): 136 बीच सैंड भंडारों के 1.315 करोड़ टन मोनाज़ाइट में 72.3 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड, और राजस्थान व गुजरात के तीन कठोर-चट्टान भंडारों में 12.9 लाख टन
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 34 अन्वेषण परियोजनाओं में 48.26 करोड़ टन रेयर अर्थ अयस्क संसाधन जोड़े हैं
- योजना परिव्यय ₹7,280 करोड़: पाँच वर्षों में ₹6,450 करोड़ के बिक्री-आधारित प्रोत्साहन और ₹750 करोड़ की पूंजी सब्सिडी (मंत्रिमंडल, नवंबर 2025)
- भारत में चुंबकों की ज़रूरत लगभग 4,000 टन है, जिसके 2030 तक लगभग 8,000 टन होने का अनुमान है (मंत्री, लोकसभा, 25 मार्च 2026)
- पिछले 10 वर्षों में दुर्लभ मृदा खनिज: आयात शून्य, निर्यात 18 टन (संसद में उत्तर, 23 जुलाई 2025)
- IREL का आलुवा स्थित रेयर अर्थ्स डिवीज़न नियोडिमियम-प्रेसियोडिमियम सहित अलग-अलग रेयर अर्थ ऑक्साइड 99% से अधिक शुद्धता के साथ बनाता है
इतिहास
उल्लेखनीय उपलब्धि
26 नवंबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹7,280 करोड़ के परिव्यय वाली सिंटर्ड रेयर अर्थ स्थायी चुंबक विनिर्माण प्रोत्साहन योजना स्वीकृत की: पाँच वर्षों तक चुंबकों की बिक्री पर ₹6,450 करोड़ के बिक्री-आधारित प्रोत्साहन और ₹750 करोड़ की पूंजी सब्सिडी। योजना का लक्ष्य 6,000 टन प्रति वर्ष की एकीकृत क्षमता है, जिसमें रेयर अर्थ ऑक्साइड से धातु, धातु से मिश्रधातु और मिश्रधातु से तैयार चुंबक बनाना शामिल है, और यह क्षमता पाँच लाभार्थियों में बँटेगी। मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति के अनुसार ये भारत की पहली एकीकृत रेयर अर्थ स्थायी चुंबक विनिर्माण सुविधाएँ होंगी। भारी उद्योग मंत्रालय ने 15 दिसंबर 2025 को योजना अधिसूचित की।
यह कैसे काम करता है
लाभार्थियों का चयन न्यूनतम लागत प्रणाली के तहत वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली से होता है, जिसमें तकनीकी और वित्तीय बोलियाँ अलग-अलग होती हैं, और हर लाभार्थी को 600 से 1,200 टन प्रति वर्ष क्षमता आवंटित की जाती है। योजना आवंटन से सात वर्ष चलती है: संयंत्र लगाने के लिए दो वर्ष की तैयारी अवधि, फिर पाँच वर्ष तक चुंबकों की बिक्री से जुड़े प्रोत्साहन। तीन सबसे कम बोली लगाने वालों को IREL से NdPr (नियोडिमियम-प्रेसियोडिमियम) ऑक्साइड की सीमित सुनिश्चित आपूर्ति मिलती है, जो आलुवा में रेयर अर्थ ऑक्साइड का शोधन करती है। भारी उद्योग मंत्रालय ने 20 मार्च 2026 को निविदा जारी की, बोली की अंतिम तिथि 12 अगस्त 2026 तक बढ़ाई, और 20 बोलियाँ प्राप्त कीं, जिनकी तकनीकी बोलियाँ 13 अगस्त 2026 को खोली गईं।
आगे की राह
सरकार आयातित चुंबकों पर भारत की निर्भरता के कारण बताती है: रेडियोधर्मिता से जुड़ा 0.056%–0.058% का कम अयस्क ग्रेड, तटीय विनियमन, मैंग्रोव, वन और बसावट के कारण खनन योग्य भंडारों की सीमा, और धातु, मिश्रधातु व चुंबक बनाने वाले मध्यवर्ती उद्योगों की कमी। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ने मार्च 2026 में लोकसभा को बताया कि भारत में चुंबकों की लगभग 4,000 टन की ज़रूरत 2030 तक लगभग 8,000 टन हो जाने का अनुमान है। केंद्रीय बजट 2026-27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ कॉरिडोर की घोषणा हुई, और सामरिक क्षेत्रों के लिए विशाखापत्तनम में समेरियम-कोबाल्ट चुंबक संयंत्र चालू किया गया है। 29 जनवरी 2025 को स्वीकृत राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन में दुर्लभ मृदा भी शामिल हैं; खनिज ब्लॉकों की नीलामी और यह मिशन महत्वपूर्ण खनिज पृष्ठ पर दिए गए हैं।
आँकड़ों में
₹7,280 करोड़ की चुंबक योजना (₹6,450 करोड़ प्रोत्साहन, ₹750 करोड़ पूंजी सब्सिडी)। 6,000 टन प्रति वर्ष एकीकृत चुंबक क्षमता का लक्ष्य; 20 बोलियाँ प्राप्त (अगस्त 2026)। 1.315 करोड़ टन मोनाज़ाइट में 72.3 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड, और कठोर चट्टानों में 12.9 लाख टन (AMD, जनवरी 2026)। स्थायी चुंबकों के आयात का मूल्य के हिसाब से 59.6%–81.3% चीन से (2022-23 से 2024-25)। IREL के ओडिशा संयंत्र में 11,200 टन प्रति वर्ष मिश्रित रेयर अर्थ क्लोराइड क्षमता। स्रोत: भारी उद्योग मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग और खान मंत्रालय, PIB के माध्यम से (PRID 1883492, 2147282, 2194684, 2204625, 2220295, 2222902, 2242811, 2245038, 2248182, 2291188, 2299078; प्रेस नोट 156753 और 157165); IREL (इंडिया) लिमिटेड।
आँकड़े इस तिथि तक: योजना 26 नवंबर 2025 को स्वीकृत; तकनीकी बोलियाँ 13 अगस्त 2026 को खुलीं
स्रोत: केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्णय, PIB के माध्यम से (26 नवंबर 2025, लिंक); भारी उद्योग मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग और खान मंत्रालय, PIB के माध्यम से; IREL (इंडिया) लिमिटेड। समयरेखा में IREL की स्थापना (1950), ओडिशा का निष्कर्षण संयंत्र (2015-16 में चालू), संसद को बताया गया मोनाज़ाइट उत्पादन (2022), चुंबक योजना की स्वीकृति और अधिसूचना (2025), बजट के रेयर अर्थ कॉरिडोर, वैश्विक निविदा और प्राप्त 20 बोलियाँ (2026) दर्ज हैं। 6,000 टन प्रति वर्ष क्षमता का लक्ष्य है, उत्पादन नहीं; चुंबक उत्पादन या आयात की कोई आधिकारिक वर्षवार शृंखला प्रकाशित नहीं हुई है। · लिंक