भारत ने अपना फ़ार्मा उद्योग विश्व-स्तरीय जेनेरिक विनिर्माण पर बनाया। यह अब मात्रा से तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक, जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता (~20% वैश्विक मात्रा) और सबसे बड़ा टीका निर्माता है, दुनिया के 60% से अधिक टीके बनाते हुए। निर्यात 2014 के ~$12 अरब से बढ़कर 2024-25 तक $30 अरब से अधिक हुआ, 200+ देशों तक पहुँचते हुए।
फार्मास्युटिकल्स
भारत 'दुनिया की फ़ार्मेसी' है — जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता (मात्रा से वैश्विक आपूर्ति का लगभग पाँचवाँ हिस्सा) और दुनिया के 60% से अधिक टीके। फ़ार्मा निर्यात 2014 के लगभग $12 अरब से बढ़कर 2024-25 तक $30 अरब से अधिक हुआ, 200+ देशों तक पहुँचते हुए, अधिकांश अमेरिका व यूरोप जैसे कड़े नियंत्रित बाज़ारों में। काउंटर फ़ार्मास्युटिकल निर्यात दिखाता है।

| वर्ष | Pharma exports |
|---|---|
| 2014 | 12 $ bn |
| 2015 | 13 $ bn |
| 2016 | 16 $ bn |
| 2017 | 17 $ bn |
| 2018 | 19 $ bn |
| 2019 | 20 $ bn |
| 2020 | 24 $ bn |
| 2021 | 24 $ bn |
| 2022 | 25 $ bn |
| 2023 | 27 $ bn |
| 2024 | 28 $ bn |
| 2025 | 30 $ bn |
यह क्यों मायने रखता है किफ़ायती भारतीय जेनेरिक व टीके दुनिया भर में स्वास्थ्य लागत घटाते हैं, और उद्योग घर पर बड़ा निर्यातक व नियोक्ता है।
- फ़ार्मा निर्यात: ~$12 अरब (2014) → ~$30 अरब (2025)
- दुनिया के ~20% जेनेरिक; ~60% टीके; मात्रा से तीसरा
- स्रोत: Pharmexcil / वाणिज्य विभाग




इतिहास
प्रमुख ताक़त
भारत के पास अमेरिका के बाहर सबसे अधिक US-FDA-अनुमोदित संयंत्र हैं, और इसकी कम-लागत HIV, TB व कोविड दवाओं व टीकों ने विश्व स्तर पर लाखों जानें बचाईं। जन औषधि (किफ़ायती जेनेरिक स्टोर) जैसी योजनाएँ घर पर दवा लागत घटाती हैं, और एक PLI योजना थोक-दवा (API) उत्पादन को चीन से वापस लाने का लक्ष्य रखती है। उद्योग अब जेनेरिक से बायोसिमिलर व जटिल दवाओं की ओर बढ़ रहा है।
यह कैसे काम करता है
भारत ने जेनेरिक में महारत हासिल कर 'दुनिया की फ़ार्मेसी' नाम कमाया — दवाओं के पेटेंट समाप्त होने पर उनकी कम-लागत प्रतियाँ विशाल पैमाने पर बनाना। यह मात्रा के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा आपूर्तिकर्ता और किफ़ायती टीकों का प्रमुख स्रोत है। कमज़ोर कड़ी ऊपरी छोर है: भारत सक्रिय तत्वों (API) का बड़ा हिस्सा — रासायनिक बुनियादी खंड — अधिकतर चीन से आयात करता है, जिसे एक PLI योजना अब घर लाने की कोशिश करती है।
आगे की राह
दो दिशाएँ दशक को परिभाषित करती हैं। पहली, API में आत्मनिर्भरता — थोक दवाओं हेतु एक PLI योजना उस घरेलू रसायन-शास्त्र को फिर बनाने का लक्ष्य रखती है जो भारत ने चीन के हाथों खोया। दूसरी, मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ना — सस्ते जेनेरिक से पेटेंटेड दवाओं, बायोसिमिलर, जटिल जेनेरिक व अनुबंध अनुसंधान की ओर — ताकि भारत केवल मात्रा नहीं, अधिक मूल्य पकड़े, अपने गुणवत्ता व नियामक मानकों को विश्व-स्तरीय रखते हुए।
आगे का रास्ता
अगला क़दम मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ना है — थोक दवाओं (API) के लिए चीन पर निर्भरता घटाना, गुणवत्ता नियंत्रण व नियमन मज़बूत करना, और जेनेरिक से उच्च-मूल्य नवाचार की ओर बढ़ना।
आँकड़ों में
~$12 → ~$30 अरब फ़ार्मा निर्यात (2014→2025)। दुनिया के ~20% जेनेरिक; ~60% टीके। मात्रा से तीसरा। घरेलू बाज़ार ~$60 अरब। स्रोत: Pharmexcil, आर्थिक सर्वेक्षण।
स्रोत: Pharmexcil / Dept of Commerce — drugs & pharmaceuticals exports (US$ billion), 2014–2025.