भारत के 1,300+ द्वीप — अंडमान, निकोबार व लक्षद्वीप — लंबे समय से दूरस्थ चौकियों के रूप में देखे गए। लगभग 2020 से, एक द्वीप विकास एजेंसी व नीति आयोग मास्टरप्लान ने इन्हें नीली अर्थव्यवस्था के इंजन के रूप में पुनः परिभाषित किया, ग्रेट निकोबार प्रमुख के रूप में।
द्वीप व ग्रेट निकोबार
भारत के अंडमान-निकोबार व लक्षद्वीप द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों पर स्थित हैं पर लंबे समय से दूरस्थ व अविकसित रहे। ₹72,000-करोड़ ग्रेट निकोबार योजना के नेतृत्व में परियोजनाओं की लहर इन्हें रणनीतिक व आर्थिक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखती है। काउंटर कोलंबो या सिंगापुर के बजाय भारत में संभाले जाने वाले ट्रांसशिपमेंट माल का बढ़ता हिस्सा दिखाता है (सांकेतिक)।

| वर्ष | Transshipment handled in India |
|---|---|
| 2016 | 10 % |
| 2017 | 12 % |
| 2018 | 14 % |
| 2019 | 16 % |
| 2020 | 18 % |
| 2021 | 20 % |
| 2022 | 22 % |
| 2023 | 24 % |
| 2024 | 25 % |
| 2025 | 26 % |
यह क्यों मायने रखता है ये द्वीप भारत के समुद्री मार्गों की रक्षा करते हैं और उस ट्रांसशिपमेंट व्यापार को पकड़ सकते हैं जो आज विदेशी बंदरगाहों में जाता है — पर योजनाएँ भारत के कुछ सबसे नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र व संवेदनशील जनजातियों से होकर गुज़रती हैं।
- ग्रेट निकोबार परियोजना: ~₹72,000 करोड़
- गलाथिया बे बंदरगाह: 1.6 करोड़ TEU तक (चरण 1 ~2028)
- भारत का ~75% ट्रांसशिपमेंट अब विदेश में संभाला जाता




इतिहास
उल्लेखनीय परियोजनाएँ
केंद्रबिंदु है ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना (~₹72,000 करोड़): गलाथिया बे पर विशाल ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह (1.6 करोड़ कंटेनर तक), एक ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप व गैस-सौर बिजलीघर। अन्यत्र, समुद्री फ़ाइबर अब अंडमान को मुख्यभूमि से जोड़ता है।
यह कैसे काम करता है
ग्रेट निकोबार का तर्क भूगोल है: यह मलाक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, और आज भारत का ~75% ट्रांसशिपमेंट कोलंबो या सिंगापुर में संभाला जाता है। वहां एक गहरे-पानी बंदरगाह उस यातायात को पकड़ सकता है। परियोजना सार्वजनिक व निजी (PPP) निवेश से चलती है।
आगे की राह
यदि बना, तो गलाथिया बे बंदरगाह लगभग 2028 से चरणों में खुलेगा, पहले ~40 लाख कंटेनर व अंततः 1.6 करोड़ तक — संभवतः भारत को ट्रांसशिपमेंट ग्राहक से केंद्र में बदलते हुए। यह द्वीपों को रणनीतिक व आर्थिक संपत्ति बनाने की योजना को आधार देता है।
आगे का रास्ता
यह भारत की सबसे विवादित मेगा-परियोजना है। इसमें 130 वर्ग किमी से अधिक वर्षावन (लगभग दस लाख पेड़) साफ़ करना पड़ता है और यह शोंपेन — एक अत्यंत संवेदनशील, अधिकांशतः असंपर्कित जनजाति — व निकोबारी के आरक्षित क्षेत्रों में घुसता है, गंभीर अधिकार व सहमति प्रश्न उठाते हुए। स्थल भूकंपीय रूप से सक्रिय व पारिस्थितिकी रूप से समृद्ध है। वास्तविक चुनौती यह है कि क्या रणनीतिक व आर्थिक लाभ इन पर्यावरणीय व जनजातीय लागतों से मेल खा सकते हैं — यह बहस अब विशेषज्ञ समितियों, अदालतों व संसद में चल रही है।
आँकड़ों में
ग्रेट निकोबार परियोजना ~₹72,000 करोड़; गलाथिया बे बंदरगाह ~₹41,000 करोड़, 1.6 करोड़ TEU तक (चरण 1 ~40 लाख, ~2028); ~166 वर्ग किमी भूमि जिसमें ~130 वर्ग किमी वन मोड़ना; भारत का ~75% ट्रांसशिपमेंट अभी विदेश में। स्रोत: नीति आयोग; पत्तन मंत्रालय; PIB।
स्रोत: NITI Aayog; Ministry of Ports, Shipping & Waterways; Andaman & Nicobar administration. Transshipment-share trajectory illustrative.